Meri udaan mera aasman

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खेल शब्दो का.........(कांटेस्ट)

Posted On: 20 Jan, 2014 Contest में

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कभी कभी
शब्दो के साथ
खेलने वाले ही
भूल जाते हैं
शब्दो की बाजीगरी
रात-दिन जो
रहते हैं शब्दो के बीच
कभी कभी उनको ही
नही मिलते शब्द
कहने को अपनी बात
जाहिर करने को
अपने जज्बात ….
ऐसा लगता है मानो
रूठ गया हो खुदा भी हमसे
उनकी ही तरह
जैसे वो रूठे हैं हमसे
सिर्फ कुछ
शब्दो के कारण …
एक ख्याल
बार-बार आता है
मन के छोटे से घर में
कि क्यों नही होता ऐसा
कि जज्बात को
बांधे ही न शब्दो में
भावनाओ का बदला
भावनाओ से ……
जैसे सुना है
एक डायलॉग कि
खून का बदला खून
क्या वैसे ही
नही हो सकता
कि शब्दो की
जरूरत ही न पड़े
तब जब अक्सर
पिघलना चाहती हो
भावनाए ……
तब जब दर्द
आंसुओ में
घुलना चाहता हो …
कोई किसी से
मिलना चाहता हो ….
क्यों पड़ती है
जरूरत शब्दो की
मोहबत के दरमियाँ
कुछ ऐसा क्यों नही होता
कि सुन ले एक दिल ही
दूसरे दिल की दास्ताँ
बिना शब्दो का जाल बुने
क्योंकि अक्सर
ऐसा होता है कि
शब्दो के चक्कर में
फंस जाती हैं भावनाये
ढक जाते हैं जज्बात
आधे झूठ और
आधे सच के नीचे
और तब रह जाता है
इंसान अपने ही शब्दो के
बीच में फंसकर
और तब समझ ही
नही पाता वो कि
आखिर सच क्या है
और झूठ क्या है
वो भावनाएं झूठी थी
या ये शब्द झूठे हैं


खेल शब्दो का
अजीब नही होता ???

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14 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
January 25, 2014

बहुत अच्छी बात कही…भाव व्यक्त करने के लिए शब्दों कि ज़रूरत नहीं होती… :-) स्माइली से भी काम चल सकता है… :-)

    Sonam Saini के द्वारा
    January 27, 2014

    नमस्कार जी ……. :) :) :)

sadguruji के द्वारा
January 24, 2014

आदरणीया,सोनम सैनीजी,बहुत अच्छी कविता.आपको बधाई.कविता कि कुछ पंक्तियाँ बहुत अच्छी बन पड़ी हैं-पिघलना चाहती हो भावनाए …… तब जब दर्द आंसुओ में घुलना चाहता हो … कोई किसी से मिलना चाहता हो …. क्यों पड़ती है जरूरत शब्दो की मोहबत के दरमियाँ कुछ ऐसा क्यों नही होता कि सुन ले एक दिल ही दूसरे दिल की दास्ताँ बिना शब्दो का जाल बुने.सार्थक प्रयास.बधाई.

    Sonam Saini के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी नमस्कार ………… एक सराहना भरी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद………

January 24, 2014

सोनम जी नमस्ते, आप तो शब्दोँ से बहुत अच्छा खेल लेती हो । सुन्दर कविता के लिए बधाई

    Sonam Saini के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय चित्रकुमार गुप्ता जी नमस्कार …………तारीफ के लिए शुक्रिया … :)

sanjay kumar garg के द्वारा
January 24, 2014

सोनम जी, सादर नमन! वास्तव में खेल शब्दों का अजीब होता है. एक शब्द से ही कोइ प्राण प्रिय और कोइ जानी दुश्मन बन जाता है!

    Sonam Saini के द्वारा
    January 27, 2014

    जी संजय सर सही कहा आपने……….समय देने के लिए शुक्रिया ……..

सौरभ मिश्र के द्वारा
January 24, 2014

बिना कहे हम कह नही पाते और कहना मुश्किल

    Sonam Saini के द्वारा
    January 27, 2014

    धन्यवाद सौरभ मिश्र जी………

yogi sarswat के द्वारा
January 24, 2014

सच में होता है ! शब्दों का खेल अजीब ही होता है ! जैसे तुम शब्दों को जोड़ जोड़कर एक बेहतरीन रचना बना देती हो ! बहुत खूब

    Sonam Saini के द्वारा
    January 27, 2014

    धन्यवाद भैया समय देने के लिए ……..

neena के द्वारा
January 22, 2014

शब्दो का खेल मन के कई रंगो उकेरता है .अच्छी कविता .स्नेह सोनम

    Sonam Saini के द्वारा
    January 27, 2014

    आदरणीय नीना मैम नमस्कार ………आपने अपना कीमती समय रचना को दिया तहे दिल से शुक्रिया मैम ….


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