Meri udaan mera aasman

हार नही है जीत नही है जीवन तो बस एक संघर्ष है ........

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हर अच्छे शब्द सच नही होते …

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मेरे इतने सारे लेख व कविताये पढ़कर आप मेरे विचारो के बारे में बहुत कुछ तो जान ही गये होंगे ? आप लोगो की जानकारी को थोडा और बढ़ाते हुए अपनी एक और खास आदत के बारे में आपको बताती हूँ ! वैसे तो मेरी कई सारी बुरी आदते हैं लेकिन एक जो सबसे ज्यादा बुरी है वो है कि ‘अगर मेरे मन में कोई विचार आता है जो कि लेख या कविता का रूप ले सके तो मैं उसे एक लेख या कविता की शक्ल देने में ज्यादा समय नही लगाती’, अगर किसी कारण वश मैं उन विचारो को शब्दों में ढालकर लेख या कविता का रूप नही दे पाती तो ‘वो विचार तब तक मेरे दिल और दिमाग दोनों को झकझोरते रहते है जब तक कि वो आप लोगो तक न पहुँच जाये !


‘लैपटॉप लेकर मैं अपना कुछ ऑफिसियल काम करने बैठी थी लेकिन मन में चल रही हलचल ने एक नये विचार को जन्म दे दिया’, मन में उठ रही विचारो की हलचल ने मुझे मेरा काम करने ही नही दिया और तब मजबूरी वश मुझे ये लेख लिखना ही पड़ा !


“वास्तव में मैं किसी और बात से ही परेशान थी, परेशान रहने की मेरी आदत सी हो गयी है, कभी छोटी-छोटी बातो पर परेशान हो जाती हूँ तो कभी बिना मतलब की बातो पर ! ऐसे ही सोच रही थी कि लोग जो वास्तव में होते हैं, वास्तव में वैसे दिखते नही हैं, और जैसे दिखते हैं वैसे वास्तव में होते नही है ! मुझे आज तक एक बात समझ नही आई कि हर कोई, हर किसी की, हर एक बात से सहमत कैसे हो सकता है ? ये जरूरी तो नही कि दुनिया में जितने भी अच्छे विचार होते हैं वो सारे के सारे सच ही होते हैं, कुछ झूठ भी तो हो सकते हैं न ? जरूरी तो नही कि मसहूर लोग जो भी बोले वो सभी सही ही हो ? जरूरी तो नही कि हर एक कहावत हकीकत के धरातल पर सटीक ही बैठती हो ? जरूरी तो नही कि हर एक “थॉट ऑफ़ द डे” सच्चाई ही बयान करता हो ?


‘यही वो सवाल थे जिन्होंने इस पोस्ट को जन्म दिया और मुझे मजबूर किया कि मैं सभी बातो पर आँख बंद करके भरोशा न करूं बल्कि हकीकत को समझूँ।


(1) सदा सकारात्मक सोचो :- मैंने अक्सर लोगो से ये सुना है कि परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों इंसान को सदा सकारात्मक ही सोचना चाहिए ! फेसबुक पर किसी ने इसी बात को शेयर किया हुआ था ‘सदा सकारात्मक सोचो’ ! उस “सदा सकारात्मक सोचो” वाली पोस्ट पर मैंने जितने भी कमेंट पढ़े सभी में यही लिखा था कि ‘हाँ इंसान को हमेशा सकारात्मक ही सोचना चाहिए’ , ‘ऑलवेज बी पॉजिटिव’ !


मेरे शोध के अनुसार सच्चाई इससे बिलकुल अलग है ! इंसान की सोच परिस्थितियो पर ही निर्भर करती है, जहाँ हमारा दिमाग हर एक मिनट के बाद अलग सोचने लगता है वहाँ अलग-अलग परिस्थतियो में एक सा कैसे सोचा जा सकता है ? “जब कोई इंसान भारी दुःख में है तब आप उससे कहें कि “सकारात्मक सोचो” मेरा दावा है ये कि आपके लाख कहने पर भी वह सकारात्मक नही सोच पायेगा ! क्योंकि उसकी परिस्थितियां उसे ऐसा सोचने नही देंगी ! उल्टा वह आपसे खिन्न जरुर हो जायेगा ! दुःख में इंसान किसी का साथ चाहता है जो उसकी भावनाओ को समझ सके, जो अपने व्यवहार से उसके दुःख को कम कर सके, न कि सिर्फ बातो से ये कहता रहे कि ‘ सकारात्मक सोचो’, ‘सकारात्मक सोचो’ !


मेरी आंटी कम बेस्ट फ्रेंड श्रीमती सिन्हा मुझसे हमेशा कहती हैं कि ‘कुछ सकारात्मक करो’ ! उनके साथ साथ मेरा भी यही मानना है कि इंसान को सिर्फ सकारात्मक सोचना नही चाहिए बल्कि उसे “सकारात्मक करना चाहिए”, तभी वह अपनी नकारात्मकता को पीछे छोड़ कर जीवन में आगे बढ़ सकता है ! “जैसे प्रकृति अपने हिसाब से काम करती है वैसे ही हमारा दिमाग और दिल भी अपने हिसाब से ही काम करता है ! आप लाख बीती बातो को भूलकर आगे बढ़ने की कोशिश करें आपका दिल और दिमाग आपको बार-बार वही लाकर खड़ा कर देता है ! ऐसे में आप सिर्फ अपने काम से ही अपनी सोच को बदल सकते हैं !


(2) प्यार किया तो डरना क्या :- एक कहावत ये भी है ‘जब प्यार किया तो डरना क्या’, फ़िल्म मुगल-ए-आजम का एक गीत में इसी कहावत को एक्सप्लेन किया गया है, वही सलमान खान की एक फ़िल्म का नाम भी यही है ! “प्यार किया तो डरना क्या”, इस कहावत ने न जाने कितने युवक-युवतियो पर गलत प्रभाव डाला है ! जिसके कारण उन्हें अपनी जान भी गवानी पड़ी है ! लोगो ने “प्यार किया तो डरना क्या”, का मतलब ‘खुलेपन से’, ‘बेशर्मी’ से लिया है ! महज आकर्षण को प्यार का नाम देकर लोग खुले आम बेशर्मी की सारी सीमायें तोड़ देते हैं ! ऐसे में उन्हें अगर कोई रोके या टोके तो वो इस कहावत को दोहरा देते हैं “प्यार किया तो डरना क्या” !


मेरा मानना तो ये है कि अगर आप प्यार करते समय उपरोक्त कहावत के अनुसार न चल कर थोडा डर लेंगे तो ‘एक सही फैसला ले सकेंगे’ क्योंकि कई बार न डरने के चक्कर में लोगो को अपनी जान से हाथ तो धोना पड़ा ही है साथ ही साथ कई बसे हुए परिवार भी उजड़ गये ! “कई बार लोग सिर्फ खुद को निडर साबित करने के लिए झूठ को सच साबित करने लगते हैं”, यह जानते हुए भी कि ‘जो वह करने जा रहे हैं वो उनके परिवार के लिए तो सही है ही नही बल्कि खुद के लिए भी सिर्फ १०% ही सही है, प्यार की निडरता को साबित करने के लिए गलत कदम उठा लेते हैं जिसका खामियाजा उन्हें खुद भी और उनके निर्दोष परिवार को भी भुगतना पड़ता है” !


“और भी कई बाते हैं जो मुझे अच्छी नही लगती या यूँ कहूं कि चुभती हैं ! पहले में एक थरेपी सेंटर में काम करती थी जहाँ रोज ही लगभग हज़ारो लोगो से मिलती थी, बात करती थी, उनके बारे में जानती थी ! मैंने जितना समय वहाँ बिताया हर एक पल से एक नयी बात सीखी ! उस जॉब ने मुझे सिखाया कि “Richness makes the people egotistic, emotionless and may be heartless”. इंसान जैसा बाहर से दिखता है हकीकत में वैसा कभी होता ही नही ! किसी को किसी की परवाह नही है इस दुनिया में ! कुछ लोग मुझे इसलिए बुरा मानते हैं क्योंकि मैं जो कहती हूँ सामने कह देती हूँ, जो जैसा है वो वैसा ही है, अगर मैं उनसे कहती हूँ तुम ऐसे हो तो मुझे नही लगता कि मैं गलती करती हूँ ! सिर्फ कुछ लोगो को छोड़कर (मेरे अनुभव के अनुसार) बाकी सभी लोग डबल फेसेस पर्सन मुझे लगे ! जो सामने कुछ और कहते हैं और पीठ पीछे कुछ और !


“अक्सर फेसबुक पर मैंने देखा है लोगो को एक दूसरे का मज़ाक बनाते हुए”, वो भी उन लोगो द्वारा जो फेसबुक पर बहुत ही सम्मानीय, आदरणीय और बहुत ही सभ्य कहलाते हैं !”अगर आपके हिसाब से किसी में बुराई है तो उस बारे में आपको सीधे उस इंसान से बात करनी चाहिए न कि और लोगो के साथ मिलकर उसका मज़ाक बनाना चाहिए ! अक्सर लोग खुद जो करते हैं उसे सही कहते हैं और सामने वाले को बुरा”, यही आज के इंसान की हकीकत है !


“हर इंसान की अपनी सोच, अपना अलग नजरिया होना चाहिए”, जब भी कुछ लिखे या कमेंट करे तो अपने विचारो के हिसाब से करे न कि पब्लिसिटी के लिए बस हाँ में हाँ मिला दे ! अगर इंसान जैसा है वैसा ही व्यवहार करे तो क्या उसकी इज्जत कम हो जाती है या वो गरीब हो जाता है ?


“बनी बनायी बात पर हाँ में हाँ न मिलाएं बल्कि सच्चाई को समझे, जो सही है उसे ही सही कहे, और अगर आप किसी को अपनी बात कहने का हक़ देते हैं तो उसे अपनी बात भी कहने दे’, ये नही कि आप जो सोचते हैं वही सही है, सबका अपना-अपना नजरिया है तो सोच भी अलग ही होगी ! अगर कोई आपसे सहमत नही होता तो इसका ये मतलब नही कि वो बुरा इंसान है, या उसे समझ नही है ! जिस तरह आपको अपनी बात कहने का अधिकार है वैसे ही दुसरो को भी है !


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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
September 24, 2015

मैं आपके विचारों से सहमत हूँ सोनम । हमें लोगों द्वारा कही जाने वाली बातों को स्वविवेक की कसौटी पर कसकर ही देखना होता है कि वे किस सीमा तक हमारे लिए स्वीकार्य और व्यावहारिक हैं । इसके अतिरिक्त दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को देखना-समझना और उसकी विचार-शक्ति का सम्मान करना व्यक्ति की परिपक्वता का ही परिचायक होता है जो अक्सर फ़ेसबुक सरीखी सोशल साइटों पर नज़र नहीं आता । जहाँ तक सकारात्मक सोच संबंधी बातों का सवाल है, यहाँ भी मैं आपके विचारों से सहमत हूँ । जो दुखी है, शोकाकुल है, व्यग्र और चिंतामग्न है; उसके लिए तो सकारात्मक सोच का उपदेश चिढ़ ही पैदा करेगा । बात यह है सोनम कि दूसरे का ग़म बांटना भी एक कला है जो बहुत कम लोगों को आती है । किसी का ग़म बांटने के लिए उसकी बात को सुनना और उसके आँसुओं को पोंछना ज़रूरी होता है न कि उसके सामने सकारात्मक सोच का राग अलापना और अपनी ही हाँके जाना । समझाने वालों की क्या कमी है दुनिया में । हर गली, कूचे, नुक्कड़ पर मिल जाते हैं । लेकिन आपको समझने वाला, आपके दर्द को महसूस करने वाला केवल भाग्य से मिलता है । दुखी इंसान को कंधा चाहिए होता है जिस पर सर रखकर वह रो सके, कोई उसे समझने वाला चाहिए होता है जो उसके मन की हालत को समझ सके । सकारात्मक सोच का उपदेश बेवक़्त झाड़ने वाले तो उसके दुख तो बढ़ाते ही हैं, कम नहीं करते ।

deepak pande के द्वारा
March 11, 2014

बहुत अच्छी सीख हम ख्याल रखेंगे इन बातों का

    Sonam Saini के द्वारा
    March 11, 2014

    ब्लॉग पर आपका स्वागत है दीपक जी …………समय देने के लिए शुक्रिया ………

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 4, 2014

बहुत खूब अच्छा लिखा है .लिखती रहिये आभार मदन कभी इधर का रुख करें

    Sonam Saini के द्वारा
    March 6, 2014

    धन्यवाद मदन मोहन सक्सेना जी ….

jlsingh के द्वारा
March 3, 2014

“बनी बनायी बात पर हाँ में हाँ न मिलाएं बल्कि सच्चाई को समझे, जो सही है उसे ही सही कहे, और अगर आप किसी को अपनी बात कहने का हक़ देते हैं तो उसे अपनी बात भी कहने दे’, ये नही कि आप जो सोचते हैं वही सही है, सबका अपना-अपना नजरिया है तो सोच भी अलग ही होगी ! अगर कोई आपसे सहमत नही होता तो इसका ये मतलब नही कि वो बुरा इंसान है, या उसे समझ नही है ! जिस तरह आपको अपनी बात कहने का अधिकार है वैसे ही दुसरो को भी है ! प्रिय सोनम, आशीष .. मन का भाव व्यक्त कर देने से मन हलका हो जाता है.सोसल साइट्स एक ऐसा ही जगह है. बड़े लोगों द्वारा कही गयी सभी अच्छी बातें सही कैसे हो सकती है. बड़े लोग अपने अनुभव के आधार पर अपनी बात कहते हैं, समय के अनुसार मान्यताएं और अर्थ बदल जाते हैं.अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल हमेशा करनी चाहिए. सकारात्मक सोचो और सकारात्मक करो – इसमे क्या गलत है? दुःख में हर ब्यक्ति दुखी होता है और सुख में खुश.होता है. यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है. दुःख में धैर्य धारण करना चाहिए, तभी आदमी का दुःख कम होगा, नहीं तो वह दुखों के बोझ से दब जायेगा टूट जायेगा और कोई गलत कदम उठा लेगा. आज बढ़ती आत्महत्याओं के कई कारणों में एक कारण यह भी है कि आज लोगों में धैर्य की कमी हो गयी है. आज इंसान सब कुछ जल्दी में प्राप्त कर लेना चाहता है, नहीं मिलने पर दुखी होता है. जब प्यार किया तो डरना क्या सत्य लगता है —और ऐ मालिक तेरे बन्दे हम ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बदी से डरें, ताकि हंसते हुए निकले दम…में सच्चाई नहीं दीखती? …प्रयत्नहीन प्रार्थना, प्रार्थना हो ही नहीं सकती … एक बात और कहूंगा …कार्यालय में या कार्यशाला में अपना कर्त्तव्य का पालन पहला धर्म है …मन न लगे तो छुट्टी ले लेनी चाहिए …बेमन से कोई काम करने में गलती होने की सम्भावना रहती है. …मैं भी प्रवचन दिए जा रहा हूँ …हो सकता है तुम्हे अच्छा लगे या न लगे… पर जब तुमने मंच पर यह बात साझा की है तो अपना विचार रखने का तो हक़ बनता है. सदा खुश रहो, निश्छल रहो….

    Sonam Saini के द्वारा
    March 6, 2014

    आदरणीय जे एल सिंह सर जी नमस्कार ….जी “सकारात्मक सोचो और सकारात्मक करो” में गलत कुछ भी नही है, लेकिन सकारात्मक करने को कहता कौन है ? सभी सिर्फ ये कहते हैं कि सकारात्मक सोचो …. आप ही बताइये अगर इंसान सिर्फ सोचता रहेगा और करेगा नही तो क्या कुछ सकारात्मक हो फायदा होगा ?…………….”दुःख में हर ब्यक्ति दुखी होता है और सुख में खुश.होता है. यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है. दुःख में धैर्य धारण करना चाहिए, तभी आदमी का दुःख कम होगा, नहीं तो वह दुखों के बोझ से दब जायेगा टूट जायेगा और कोई गलत कदम उठा लेगा.”…………. ऊपर आपने ही यह लिखा है, मैं भी बिलकुल यही कहना चाह रही थी लेकिन ठीक से समझा नही पायी, इंसान अगर दुःख में धैर्य रख कर कुछ सकारात्मक कार्य करे तब ही वह अपने दुःख से बहार निकल सकता है …..आप ही बताइये क्या गहरे दुःख में सकारात्मक सोचा जा सकता है ??? … प्रतिक्रिया की कुछ आखरी लाइनस मुझे ठीक से समझ नही आयी …… ….. :”और ऐ मालिक तेरे बन्दे हम ऐसे हों हमारे करम, नेकी पर चलें और बदी से डरें, ताकि हंसते हुए निकले दम…में सच्चाई नहीं दीखती? …प्रयत्नहीन प्रार्थना, प्रार्थना हो ही नहीं सकती … एक बात और कहूंगा …कार्यालय में या कार्यशाला में अपना कर्त्तव्य का पालन पहला धर्म है …मन न लगे तो छुट्टी ले लेनी चाहिए …बेमन से कोई काम करने में गलती होने की सम्भावना रहती है. ……”…… ….”अपने विचार रखने का हक़ सभी को होता है आपको भी है सर जी…इसमें मुझे कैसे बुरा लग सकता है….. ? शुभकामनाओ हेतु धन्यवाद … :)

सौरभ मिश्र के द्वारा
March 3, 2014

अच्छा है 1-दुनिया मे कोई 2 लोग भी ऐक तरह नही सोचते। 2-कोई किसी के मन मे देख नही सकता 3-सब को मिला के चलोगे तो प्रयोगात्मक रुप से खुश रहोगे और भी बहुत कुछ

    Sonam Saini के द्वारा
    March 6, 2014

    प्रतिक्रिया हेतु शुक्रिया सौरभ जी …


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