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शादी बनाम दहेज़

Posted On: 24 Mar, 2014 लोकल टिकेट,social issues,Others में

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Sonam\’s writer Page

शादी —– हमारे समाज में शादी को जीवन में बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है ! जिस इंसान की शादी नही होती या जो अपनी मर्जी से शादी नही करता उसके बारे में हमारा समाज, समाज के लोग अच्छी सोच नही रखते ! शादी न होने या न करने के पीछे क्या कारण हो सकता है यह जाने बिना ही लोग अपने-अपने मनघड़त विचार उस इंसान के बारे में बना लेते हैं !

अगर भारतीय सविधान की बात की जाये तो भारत में यह कानून है कि 18 वर्ष के बाद हर इंसान को अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने का अधिकार है ! जो जैसे चाहे अपने जीवन को जी सकता है लेकिन वास्तव ऐसा है नही ! बेशक हमारा कानून हमे अपना जीवन अपने हिसाब से जीने की आज़ादी देता हो लेकिन इसी देश में रहने वाला ये समाज किसी को भी ऐसी आज़ादी नही देता ! यहाँ शादी न करने वाले को बात-बात पर ताने मार दिए जाते हैं !

मेरा पहला प्रश्न यही है कि भारत कहने को तो आधुनिक हो गया है, समाज का हर एक वर्ग खुद को आधुनिक बना चुका है, मान चुका है फिर सोच का दायरा आज भी वही एक जगह आकर क्यों ठहरा हुआ है ?? सोच एक दायरे में क्यों सिमित हैं ?? क्यों समाज एक व्यक्ति को उसकी शादी का फैसला स्वयं लेने की आज़ादी नही देता ???

बात शादी की चली है तो दहेज़ की बात भी जरुर होगी ! बिना दहेज़ के शादी तो भूल ही जाइये ! मुझे लगता है कि व्याकरण को थोडा अमेंडमेंट करने की जरूरत है ! जब व्याकरण में पर्यायवाची शब्द लिखे जाये और उसमे शादी का पर्यायवाची लिखा जाये तो सबसे पहले दहेज़ शब्द आना चाहिए ! अगर देखा जाये तो शादी का मतलब दहेज़ ही तो होता है ! जब तक आपके पास कम से कम 5 -6 लाख रुपये न हो तब तक आप सामान्य रूप से शादी के बारे में नही सोच सकते !

मेरी उलटी खोपड़ी में ये बात बैठती नही है कि शादी के लिए पैसो की क्या जरूरत ? जहाँ तक मुझे समझ में आता है “शादी के लिए ‘एक लड़के और एक लड़की’ की, मंत्र पढ़ने के लिए एक पंडित जी की और आशीर्वाद देने के लिए माता-पिता व सगे सम्बन्धियो की जरूरत होती है ! अगर आज की महंगाई को देखते हुए भी ” पूजा, हवन इन सब के लिए आने वाले सामान पर होने वाले खर्च” की कैलकुलेशन करूँ तो भी ज्यादा से ज्यादा 50 हज़ार रुपये का खर्च हो जायेगा ! फिर उसके बाद 50-60 हज़ार में सब के लिए अच्छा खाना भी बन सकता है ! कुल मिलकर अगर मेरे हिसाब से चला जाये तो 1-1.5 लाख में एक अच्छी शादी हो सकती है ! और अगर इतने पैसे भी न हो तो खाने का प्रोग्राम कैंसिल कर दे तो सिर्फ पचास हज़ार में बढ़िया शादी हो जायेगी !

ये तो था मेरा कैलकुलेशन अब बात करते हैं हमारे समाज के कैलकुलेशन की ! हमारे समाज में शादी, शादी न रहकर एक व्यापार बन गया है ! शादी में सात फेरो, सात वचनो का महत्व कम होता जा रहा है और भव्यता और दिखावे का चलन ज्यादा बढ़ता जा रहा है ! हमारे समाज में लोगो की यह एक धारणा बन गयी है कि जो अपने बच्चो की शादी पर जितना ज्यादा खर्च करेंगे उनके बच्चो को उतना ही अच्छा ससुराल व जीवनसाथी मिलेगा, जो सच नही है ! कोई शादी आदर्श शादी होगी या नही यह “दो लोगो व उनके परिवार के व्यव्हार व किस्मत पर” निर्भर करता है न कि शादी पर किये गये खर्च पर !

आजकल लोग भेड़चाल वाला फार्मूला ज्यादा अपनाते हैं ! लोग एक-दूसरे की देखा-देखी काम करने लगे हैं ! पहले दुसरो की शादी में जाते हैं, वहाँ के आयोजन की व्यवस्था को देखते हैं, खर्च और भव्यता का अनुमान लगते हैं और फिर ये निश्चय करते हैं कि हमारे घर में होने वाली शादी इससे ज्यादा शानदार होगी ! न जाने कितने लाख रुपये तो लोग खाने पर खर्च कर देते हैं ! आजकल मैंने अधिकतर लोगो के मुह से ये बात सुनी है कि हमे तो ज्यादा मसाले वाला खाना सूट ही नही करता ! वास्तव में वो सच ही कहते हैं – आजकल अधिकतर लोग किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त होते हैं ऐसे में वो कम तेल, मसाले वाला खाना, खाना ही पसंद करते हैं ! लेकिन जैसा हम सभी जानते हैं कि आजकल शादी में लगभग 15-20 आइटम तो बनते ही बनते हैं, ये जितना मुझे याद आया उसके हिसाब से बताया, जो एक एस्टीमेट वैल्यू है ! अगर आप किसी शादी में जाकर वहाँ बने खाने के आइटमस की गिनती करेंगे तो संख्या 20 के पार आराम से पहुँच जायेगी, विश्वाश न हो तो इस बार जब भी शादी में जाये गिनती जरुर करे !

शादियों में बनने वाले खाने का 25% खाना बेकार ही कूड़े कचरे में फेंका जाता है ! जिससे मुझे तो नही लगता कि किसी का कोई भला होता होगा ! हाँ नुकसान जरुर होता है जिसे शादी आयोजित करने वाला हँसते-हँसते सहन कर लेता है क्योंकि उसे भी तो अपने स्टेटस की चिंता होती है ! अगर कोई अपनी शादी में खाने के इतने आइटम्स न बनवाये तो लोग कहने लगते हैं कि अरे खाने में तो कुछ था ही नही ! यहाँ लोगो से मेरा तात्पर्य “हम सभी” से ही है ! मेरा दूसरा प्रश्न यही है कि क्या बिना “कम से कम 15-20 खाने के आइटम्स” के कोई शादी संपन्न नही हो सकती ?? क्या एक आदर्श शादी का सम्बन्ध शादी में बनने वाले खाने से भी होता है ??? या ये सिर्फ समाज में अपने स्टेटस को बनाये रखने के लिए किया जाता है ???

अभी लगभग एक महीने पहले हमारे पड़ोस में एक लड़की की शादी हुई है ! उसके पापा ने उसकी शादी में उसे लगभग 15 लाख की एक गाड़ी दी है ! न जाने कितने सोने-चांदी के गहने दिए हैं जिसके बारे में मुझे ठीक से नही पता कि कितने दिए हैं लेकिन घर में किसी के मुह से ये जरुर सुना था कि बहुत दिया है, बहुत ही आलिशान शादी की है ! अब 15 लाख की गाड़ी दी है तो 10-12 तो अलग से तैयारियो में भी लगा ही दिए होंगे ! कुल मिलकर 25-30 लाख तो उनकी शादी का खर्च हो ही गया होगा ! ये कहानी आज सिर्फ एक घर की नही है बल्कि आज कल तो अधिकतर ऐसा ही होता है ! लोग यूँ ही बढ़ चढ़ कर दहेज़ लेते-देते हैं और जब कभी कहीं किसी से ये खबर सुनते हैं कि किसी लड़की को दहेज़ के लिए ससुराल से निकाल दिया गया या मार दिया गया तो दहेज़ लेने व देने को पाप बताने लगते हैं और जो लोग ऐसा करते हैं उन्हें पापी ! मेरा तीसरा सवाल ये है कि क्या सिर्फ “कोरी बाते” करने से, एक-दूसरे पर सवाल उठाने से दहेज़ के कारण होने वाली दुर्घटनाओ को रोका जा सकता है ?? क्या हमे थ्योरी को छोड़कर अब प्रक्टिकल नही हो जाना चाहिए ??? खुद से शुरुआत करने में क्या बाधा है ??? क्या इस बाधा का कारण शर्म है या फिर हमारा लालच या फिर हमारी छोटी सोच??? आखिर कब होगी शुरुआत ????

अभी आप में से बहुत से लोग शायद ये भी कहें कि दुनिया में सभी लोग एक जैसे नही है ! कुछ लोग अच्छे भी हैं ! हाँ मैं मानती हूँ कि दुनिया में सभी एक जैसे नही होते, कुछ लोग अच्छे भी होते हैं लेकिन लोग चाहे कितने भी अच्छे हो शादी के समय हर एक बेटी के माता-पिता के मन में सिर्फ चिंता ही होती है ! ” लड़के वाले बेशक ये कह दें कि उन्हें कुछ नही चाहिए” परन्तु फिर भी एक पिता को तो देना ही पड़ता है जिसे लोग अपने-अपने हिसाब से नाम दे देते हैं ! कोई ये कहता है कि जो भी दिया अपनी बेटी को ही तो दिया, कोई ये कहता है कि इतना तो आजकल सभी देते हैं इसमें क्या बड़ा काम कर दिया ! अगर शादी में ये लेने-देने के प्रचलन को ही खत्म कर कर दिया जाये तो ही शायद कोई बात बन सकती है ! अगर ये नियम बना दिया जाये कि शादी इस सादे तरीके से हो चाहे फिर वो अमीर हो या गरीब तो ही माता-पिता की चिंता दूर हो सकती है ! तब ही माता-पिता के लिए उनकी बेटियो की शादी एक चिंता का विषय नही बल्कि एक ख़ुशी का अवसर कहलायेगा वरना अधिकतर माता पिता के लिए तो बेटी की शादी ख़ुशी से ज्यादा चिंता लेकर आती हैं !

अंत में इतना ही कहना चाहूंगी कि नियम अपनी जगह है, वो जब बनेगे तब ही फॉलो किये जायेंगे लेकिन अगर बड़ो के साथ-साथ बच्चे भी थोड़ी समझदारी दिखाए तो दहेज़ से होने वाली हर समस्या का समाधान किया जा सकता है ! लड़को को दहेज़ न लेने के लिए खुद पहल करनी होगी, अगर माता-पिता दहेज़ लेना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए मना करना होगा, उन्हें समझाना होगा ! इसी तरह लड़कियो को भी हाथ पर हाथ रखकर नही बैठना है, अगर उनकी शादी से उनके माता-पिता के जीवन में दुःख आते हैं तो उन्हें ऐसी शादी से खुद ही पीछे हट जाना होगा ! अधिकतर ऐसा देखा गया है कि बेटी की शादी में लोग कर्ज ले लेते हैं और फिर जीवन भर उस कर्ज के भार तले तबे रहते हैं ! कर्ज का यही भार कई पिताओ की जिंदगी भी छीन चुका है ! ये फैसला आपको खुद करना होगा कि आपको सिर्फ शादी से मतलब है या फिर अपने माँ-पापा के सुख-दुःख का भी ख्याल है !

आप शुरुआत कब करना चाहेंगे बदलाव की ????????????


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24 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

munish के द्वारा
April 1, 2014

सोनम जी किसी भी प्रथा के पीछे कुछ न कुछ सार्थक पहलू अवश्य होता है . और दहेज़ के पीछे भी था . जाहिर तौर पर नव युगल को अपनी नयी नयी गृहस्थी चलाने में सहायता देना जिसको कन्या धन भी कहा गया है . लेकिन व्यक्ति के स्वार्थ ने एक सार्थक प्रथा को कुप्रथा में बदल दिया . आज समाज में नकारात्मक सोच हर जगह व्याप्त है . सामान्यतः यदि कोई व्यक्ति अपने बच्चों का विवाह बिना दहेज़ के करना स्वीकार करता है तो लड़की वाले ही कहते हैं लड़के में ही कोई खोट है . और ये केवल संपन्न परिवारों के साथ नहीं है बल्कि उन लोगों के साथ भी है जो आर्थिक रूप से संपन्न नहीं हैं .

    Sonam Saini के द्वारा
    April 2, 2014

    मुनीश जी नमस्कार ……. अपने विचार रखने के लिए शुक्रिया …..

yogi sarswat के द्वारा
March 31, 2014

प्रिय सोनम ,आपका लेख आपकी परिपक्वता और मजबूत संकल्प शक्ति का परिचायक है,दहेज़ हमारे देश में अभिशाप है,और उसके लिए अगर कोई कुछ कर सकता है तो युवा पीढ़ी ही कर सकती है,जिनके पास काला धन है वो बे तहाशा खर्च करते हैं,पर पैसे से खुशियाँ नहीं खरीदीं जा सकतीं,सबसे ज्यादा विवाह विच्छेद भी उनके ही होते हैं ,दूसरी बात सब लडकियाँ आपके जैसी विवेकशील भी नहीं होतीं,वो खुद ही अपने माता पिता से शादी में गहने और अन्य चीजों की फरमाइश करतीं हैं,आपका आलेख नई अलख जगाये,एसी उम्मीद है ,अनेक शुभकामनाये, हार्दिक बधाई और ये भी आशार करता हूँ कि आपका लेखन , आपकी सोच , आपके विचार जन जन तक पहुंचें और लोग इस बात पर गौर करें कि क्या वो इस लेख में लिखे शब्दों का दस प्रतिशत भी अपने जीवन में उतार सकते हैं ?

    Sonam Saini के द्वारा
    April 2, 2014

    धन्यवाद भैया …………..

yamunapathak के द्वारा
March 30, 2014

प्रिय सोनम तुम्हारा यह ब्लॉग बहुत ही सटीक है

    Sonam Saini के द्वारा
    March 31, 2014

    आदरणीय यमुना मैम नमस्कार …… आपने सराहा अच्छा लगा, समय देने के लिए शुक्रिया मैम … :)

chandraamit के द्वारा
March 28, 2014

आपकी बात तो सही है . पर सामाजिक मानसिकता इसे Property dealing क़ी तरह भी देखती है . CASH, FLAT ,PLOT, Home Appliances, Four and Two wheeler Etc. and Fair completion उनको लड़की कि Education से भी कोई मतलब नहीं होता जहाँ ज्यादा “मिल” रहा होता है वहाँ ही लगे रहते है. ऐसे में कोई बदलाव क्यों लाना पसद करेगा

    Sonam Saini के द्वारा
    March 31, 2014

    जी…. सर नमस्कार ……. प्रॉब्लम तो यही है कि कोई बदलाव लाना नही चाहता , देखिएगा मेरी बात सिर्फ पढ़ने तक ही सिमित रह जायेगी, क्योंकि किसी को बदलाव से फायदा नही होगा,,,,,, लेकिन फिर हमे कोशिश करते रहना चाहिए …. शायद हम ही कुछ बदल दे … समय देने के लिए शुक्रिया

abhishek shukla के द्वारा
March 28, 2014

प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति सोनम जी! जिन अभिभावकों और बच्चों में थोड़ी सी भी मानवता बची है वे दहेज़ का विरोध मुखरित हो कर करते हैं, नयी पीढ़ी इससे बचना भी चाहती है, बस अभिभावकों को जाती प्रथा से थोडा ऊपर उठ कर सोचना चाहिए…

    Sonam Saini के द्वारा
    March 31, 2014

    अपने विचार रखने के लिए शुक्रिया अभिषेक शुक्ल जी …..

OM DIKSHIT के द्वारा
March 27, 2014

सोनम जी,साहसिक लेख के लिए बधाई.मेरा उत्तर तो आप के लेख में ही है.इसमें दोष तब उत्पन्न होता है जब….एक लड़की का पिता किसी लड़के के लिए ,दूसरे पिता से आगे बढ़कर दहेज़ का प्रस्ताव करता है.वह भी दिखावे का दोषी है,यह जानते हुए भी कि पैसे से किसी लड़की का भाग्य नहीं बदला जा सकता है.इस कुप्रथा के समाप्ति लिए दोनों पक्ष की जिम्मेदारी बनती है.मेरा तो यह मानना है कि ,बहू रुपी लक्ष्मी लड़केऔर ससुराल का भाग्य बदल देती है.

    Sonam Saini के द्वारा
    March 31, 2014

    आदरणीय ओम दीक्षित जी नमस्कार .., जी आपकी बात से सहमत हूँ, समय देने के लिए शुक्रिया

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 27, 2014

प्रिय सोनम ,आपका लेख आपकी परिपक्वता और मजबूत संकल्प शक्ति का परिचायक है,दहेज़ हमारे देश में अभिशाप है,और उसके लिए अगर कोई कुछ कर सकता है तो युवा पीढ़ी ही कर सकती है,जिनके पास काला धन है वो बे तहाशा खर्च करते हैं,पर पैसे से खुशियाँ नहीं खरीदीं जा सकतीं,सबसे ज्यादा विवाह विच्छेद भी उनके ही होते हैं ,दूसरी बात सब लडकियाँ आपके जैसी विवेकशील भी नहीं होतीं,वो खुद ही अपने माता पिता से शादी में गहने और अन्य चीजों की फरमाइश करतीं हैं,आपका आलेख नई अलख जगाये,एसी उम्मीद है ,अनेक शुभकामनाये, हार्दिक बधाई

    Sonam Saini के द्वारा
    March 31, 2014

    आदरणीय निर्मला सिंह मैम नमस्कार ……….., जी काला धन ही अक्सर निर्धन परिवारो के जीवन में अँधेरा ले आता है, आपकी बात से सहमत हूँ कि जिनके पास काला धन है वो बे तहाशा खर्च करते हैं, और उनके इस बेतहाशा खर्च को देखकर ही एक माध्यम परिवार को भी उतना नही लेकिन अपनी हैसियत से ज्यादा शादी पर खर्च करना पड़ता है, ! मेरे लिए तो शादी पर किया गया खर्च फिजूल ही है, शादी पर किये जाने वाले खर्च से अगर किसी गरीब की मदद कि जाये तो वो ज्यादा अच्छा होगा ……., लड़कियो को फरमाइश करते देखकर ही मैंने यह साफ तौर पर लिखा है मैम कि लड़कियो को भी आगे आना चाहिए, उनके बेवकुफो की तरह हाथ पर हाथ रखकर नही बैठना चाहिए बल्कि अपनी एजुकेशन को हथियार बनाकर इस बुराई से लड़ना चाहिए …… इतनी सारी शुभकामनाओ के लिए तहे दिल से शुक्रिया मैम …… :) :)

sadguruji के द्वारा
March 25, 2014

आदर्बिया सोनमजी,आपका लेख सराहनीय है.आपने सही कहा है-बड़ो के साथ-साथ बच्चे भी थोड़ी समझदारी दिखाए तो दहेज़ से होने वाली हर समस्या का समाधान किया जा सकता है ! लड़को को दहेज़ न लेने के लिए खुद पहल करनी होगी, अगर माता-पिता दहेज़ लेना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए मना करना होगा, उन्हें समझाना होगा ! इसी तरह लड़कियो को भी हाथ पर हाथ रखकर नही बैठना है, अगर उनकी शादी से उनके माता-पिता के जीवन में दुःख आते हैं तो उन्हें ऐसी शादी से खुद ही पीछे हट जाना होगा ! अधिकतर ऐसा देखा गया है कि बेटी की शादी में लोग कर्ज ले लेते हैं और फिर जीवन भर उस कर्ज के भार तले तबे रहते हैं ! कर्ज का यही भार कई पिताओ की जिंदगी भी छीन चुका है ! ये फैसला आपको खुद करना होगा कि आपको सिर्फ शादी से मतलब है या फिर अपने माँ-पापा के सुख-दुःख का भी ख्याल है !इस अच्छे लेख के लिए आपको बहुत बहुत बधाई.

    Sonam Saini के द्वारा
    March 26, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी नमस्कार ……… समय देने व विचारो से सहमति हेतु शुक्रिया

sanjay kumar garg के द्वारा
March 25, 2014

सोनम जी, “दहेज़-दंश” के बारे में आपने सुन्दर विचार प्रस्तुत किये हैं! बधाई!

    Sonam Saini के द्वारा
    March 26, 2014

    सहमति हेतु शुक्रिया संजय कुमार गर्ग जी …………..

ranjanagupta के द्वारा
March 25, 2014

प्रिय सोनम !सद्भावनाएँ!बहुत गंभीर और आवश्यक विषय है ,यदि सब इसी तरह सोंचे ,तो समाज में एक नई चेतना का विस्तार हो !पर सार्थक लेखन के सहारे जो कुछ किया जा सकता है ,वह तुमने किया है बहुत बधाई !!

    Sonam Saini के द्वारा
    March 26, 2014

    आदरणीय रंजना मैम सादर नमस्कार …… सबसे पहले तो ब्लॉग पर आने के लिए शुक्रिया … :) मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हूँ कि कम से कम खुद को तो इस बुराई से दूर रख सकू, आपने मेरे विचारो से सहमति प्रकट की व कीमती समय दिया इसके लिए तहे दिल से शुक्रिया मैम ….

jlsingh के द्वारा
March 24, 2014

प्रिय सोनम, बहुत ही सार्थक विषय और सही तरीके से उठाया है… सवाल यही है कि लोग क्या कहेंगे? शुरुआत तो घर से ही होती है पर पहल कौन करे? हैम बेटी की शादी में दहेज़ देने से बचाना चाहते हैं पर बेटे की शादी में लेने के लिए सुरसा के सामान मुख फ़ैलाने में परहेज नहीं करते …ऊपर से अधिकांश लोग यही कहते मिल जायेंगे हैम तो दहेज़ के खिलाफ हैं …पर समाज में अपनी भी मर्यादा है …फलां जगह के फलां महोदय आए थे खुद से ही इतने का ऑफर दे गए थे …हमने तो उन्हें न कह दिया …मतलब आप उससे आगे बढ़िए तब हम हाँ करेंगे……यह एक सामाजिक बुराई के साथ धन की बर्बादी भी है जिसे बिरथ के ताम झाम में खर्च किया जाता है. हाँ इसके लिए नवयुवकों, नवयुवतियों को ही आगे आना होगा …समझदारी के साथ. बाकी तो समाज तभी बदलेगा जब हम बदलेंगे… एक तरह का यह भी भ्रष्टाचार ही है.

    Sonam Saini के द्वारा
    March 26, 2014

    आदरणीय जे एल सिंह सर जी नमस्कार ……….सही कहा आपने कि लोग बेटी की शादी में दहेज़ देने से बचाना चाहते हैं पर बेटे की शादी में लेने के लिए सुरसा के सामान मुख फ़ैलाने में परहेज नहीं करते …वास्तव में अगर देखा जाये तो दहेज़ प्रथा को बढ़ावा देने में लड़की और लड़के दोनों के ही परिवार जिम्मेदार होते हैं , …….मेरे ऑफिस में मेरे एक कल्लिग हैं, उनकी अभी कुछ दिन पहले ही शादी हुई है, मेरा लेख पढ़ने के बाद उन्होंने कहा कि मैं भी दहेज़ के रूप में बाइक नही लेना चाहता था, मैंने मना भी किया था लेकिन लड़की के पिता माने नही …..पहल दोनों ही तरफ से होगी तभी बात बन सकती है …….. धन्यवाद सर जी …

RAHUL YADAV के द्वारा
March 24, 2014

सोनम जी वक्त को देखते हुए आपकी चिंता बिल्कुल जायज है ….सार्थक पहल है …उम्मीद करता हूं कि आप की ओर से की गई ये पहल औरों को भी प्रेरित करे ….विषय पर निरंतर ही प्रयास जारी रखे व स्वंय को इसका उदाहरण भी बनाएं …न दहेज दें और न ही लें ….।  

    Sonam Saini के द्वारा
    March 26, 2014

    राहुल जी नमस्कार ….. मेरा दृढ निश्चय तो यही है कि मैं खुद से ही शुरुआत करूं ,,, बस भगवान जी और आप सभी के आशीर्वाद की जरूरत है ….प्रतिक्रिया हेतु शुक्रिया


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