Meri udaan mera aasman

हार नही है जीत नही है जीवन तो बस एक संघर्ष है ........

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अनेक को एक बनाना होगा .....

Posted On: 15 Sep, 2014 Others,social issues में

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बहुत अच्छा सवाल है ये कि महिलाये आखिर क्या करे कि इस घिनोने समाज में खुद को सुरक्षित रख सके ? इस सवाल का जवाब एक या दो लाइनो में लिखना बहुत मुश्किल है (मेरे लिए तो बहुत मुश्किल है औरो का पता नही) क्योंकि मेरे हिसाब से तो किसी एक के बदलने से कुछ बदलने वाला नही है, बहुत सी बाते हैं जिनको बदलना होगा तभी जाकर इस देश में, इस समाज में कुछ बदलाव हो सकता है !

आज इस देश के किसी भी नागरिक से देश की स्थिति के बारे में पूछिये, अधिकतर का एक ही जवाब होगा कि हालात बहुत खराब हैं, महिलाओ की सुरक्षा का कोई प्रबंध नही है, देश में कानून की सख्ताई नही है, किसी को कानून का डर नही, लडकियों का, महिलाओ का अकेले घर से निकलना बहुत मुश्किल हो गया है, घर से बाहर निकलते हैं तो मन में एक डर हर पल ही बना रहता है कि हम वापस सुरक्षित घर पहुंचेंगे भी या नही !

वास्तव में ऐसा होता है, अपने इस आज़ाद देश में रहते हुए हम लडकियों को हर पल एक अनजाने डर के साये में जीना पड़ रहा है, वो आज़ादी वाली फीलिंग ही नही आती, अपने ही इस मुल्क में हम खुलकर साँस नही ले सकते, हर पल डर रहता है कि न जाने कब कौन शैतान, कहाँ से आ जाये और सब तहस नहस कर दे !

महिलाये आखिर क्या करे ? इस प्रश्न का जवाब मेरे अनुसार ये है कि जो भी करना है महिलाओ को ही करना है और जो भी कर सकती है वो महिलाये ही कर सकती हैं !

एक औरत सिर्फ एक औरत नही होती, वो एक माँ होती है, एक बहन होती है, एक पत्नी होती है, एक दोस्त होती है, और इसके साथ-साथ वो और भी न जाने कौन-कौन से रिश्तो के रूप में इस दुनिया को सुचारू रूप से चलाने के लिए अपनी भूमिका निभाती है ! अक्सर देखा जाता है कि जब बच्चा छोटा होता है तो माँ उसकी हर एक बात का ख्याल रखती है, क्या खाना है, क्या पहनना है हर एक बात का, धीरे-धीरे वो बच्चा बड़ा होने लगता है, अब माँ खाने पर तो ध्यान देती है लेकिन क्या पहनना है ये बच्चे की चॉइस पर ही छोड़ देती है, फिर वो बच्चा और बड़ा होता है, अब माँ कपड़ो के साथ-साथ खाने में भी बच्चे की चॉइस पूछने लगती है, उसे क्या पसंद है, वो क्या खाना चाहता/चाहती है या नही ये सब ! जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है माँ उसे समझदार मान कर सिर्फ कुछ बातो को छोड़कर बाकि सब कुछ उसकी ही पसंद पर छोड़ देती है, जैसे दोस्तों के साथ बाहर जाना, रात को लेट घर आना, फ़ोन पर देर तक बाते करते रहना, ये सब करने की आज़ादी अब उस बच्चे को मिल जाती है क्योंकि वो अब बड़ा हो चूका होता है और ये छोटे-मोटे फैसले तो खुद से कर ही सकता है, अमूमन इस समय इस बच्चे की उम्र 15 से 21-22 तक होती है जब तक बच्चा अपनी पढाई पूरी करता है तब तक, पढाई मेरा मतलब है ग्रेजुएशन या कोई और कोर्स (अधिकतर घरो में ऐसा ही होता है ) !

एक लड़के और लड़की के लिए हर घर में अलग-अलग नियम होते हैं, लड़के को जहाँ देर रात तक घर से बाहर रहने की परमिशन होती है वही एक लड़की को रोज़ समय पर घर आने के लिए बाध्य किया जाता है क्योंकि आजकल वक़्त बहुत खराब चल रहा है और लडकियों का देर रात तक घर से बाहर रहना नुकसानदायक हो सकता है ! एक लड़का कभी भी, किसी भी समय (रात के समय भी) अपने दोस्तों के साथ बाहर टहलने (किसी नुक्कड़, गली, चौराहे पर झुण्ड बना कर खड़े रहने) जा सकता है या पूरा-पूरा दिन बाहर रह सकता है लेकिन एक लड़की घर में सभी को बता कर और परमिशन लेकर भी 1 या 2 घंटे से ज्यादा अपने दोस्तों के साथ घर से बाहर नही रह सकती ! समय खराब चलने का एक प्रमुख कारण यह भी तो है, वो लड़के जो झुण्ड बना कर किसी गली चोराहो पर खड़े रहते हैं, रास्ते से आती-जाती लडकियों पर फब्तियां ही तो कसते हैं, छेड़खानी करते हैं और घर पर आकर बिलकुल सरीफ बन जाते हैं !

ये तो थी थोड़ी पुरानी बात, हाँ आजकल भी ऐसा होता है लेकिन सिर्फ गाँव में और कुछ छोटे शहरो में, बड़े शहरो में समय बदल चूका है, आधुनिक हो चूका है, अब लड़के और लड़की दोनों को एक समान अधिकार मिलते हैं, दोनों को एक समान अपनी मर्ज़ी से पढने-लिखने, घुमने फिरने की आज़ादी है लेकिन समानता होते हुए भी लडको से थोड़ी कम ! इस आधुनिक होते समाज में संस्कार लगभग ख़त्म ही होते जा रहे हैं ! एक मात्र यही कारण है कि भारत में जितने भी अख़बार आते है वो हर दिन बलात्कार और छेड़खानी की खबरों से भरे रहते हैं !

माता-पिता को ये तक पता नही होता कि उनके बच्चों के दोस्त कौन-कौन है, सबसे पहले एक माँ-बाप को सब काम छोड़कर इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि उसका बेटा (बेटी भी) कहाँ जाते हैं, कौन-कौन उसके दोस्त हैं, कई लड़के ऐसे होते हैं कि घर से स्कूल के नाम से निकलते हैं और सिर्फ स्कूल को छोड़कर हर जगह जाते हैं और माँ-बाप को इसके बारे में पता तक नही होता ! वो सोचते हैं कि बेटा स्कूल गया है और बेटा अपने दोस्तों के साथ इधर से उधर आवारागर्दी करता फिरता है ! लडकियों के साथ-साथ लड़के से भी हर दिन, दिन में किये गये हर एक कार्य की जानकारी लेनी चाहिए, और अगर थोडा सा भी संदेह हो तो तुरंत उसके बारे में पूरी छान-बीन करनी चाहिए !

जैसा घर का माहौल होगा वैसे ही बच्चे का आचरण होगा, शुरू से ही घर में ऐसे संस्कार विकसित करने चाहिए कि जिससे बच्चा हर इन्सान का सम्मान करना सीख जाये फिर वो इन्सान चाहे एक पुरुष हो या फिर एक महिला ! अक्सर जब किसी लड़के की कोई गर्लफ्रेंड होती है या वो लड़का किसी लड़की को एकतरफा पसंद करने लगता है तो बिना लड़की की रजामंदी जाने इस बात को लेकर लड़के की बहन, भाभी या दोस्त उस लड़की से लड़के का कांटेक्ट करवाने के लिए नयी-नयी चाले चलने लगती हैं ! बहने अक्सर अपने भाइयो के गलत काम में भी उसका साथ देने लगती है, ठीक है वो आपका भाई है आप उसकी मदद करती है अच्छा है लेकिन एक लड़की होने के नाते आपको सबसे पहले ये देखना होगा कि आप जो कर रही हैं वो सामने वाली लड़की के लिए ठीक होगा भी या नही, कहीं ऐसा तो नही कि भाई की मदद करने के चक्कर में आप एक लड़की की जिन्दगी के साथ खिलवाड़ कर रही हो क्योंकि अक्सर बहने अपने भाइयो की ख़ुशी के लिए किसी भी प्रकार से लड़की का नंबर ले आती हैं और फिर लड़की की तरफ से पॉजिटिव रेस्पोंसे न मिलने पर उस लड़के द्वारा उस लड़की को ब्लैकमेल, रास्ते में पीछा करना शुरू कर दिया जाता है जिसका अंजाम कभी-कभी बहुत भयानक भी हो जाता है !

टीवी पर जितनी अश्लीलता परोसी जा रही है उसके बारे में सभी जानते हैं, टीवी सभी देखते हैं बच्चे भी और बड़े भी ! सीरियल और फिल्मो में महिलाओ को जिस प्रकार दिखाया जाता है उसका असर भी समाज पर पड़ता है, अक्सर घर में टीवी चलता रहता है, अधिकतर माँ अपने मनपसंद सीरियल देखती रहती है और वही पास बैठा बच्चा भी उसी सीरिअल को देखता रहता है, माँ का सारा ध्यान सीरियल में है, बच्चा जो देख रहा है वो उसके देखने लायक है भी या नही माँ को खबर ही नही रहती, उसके सीरियल देखने में कोई बाधा न आये इसीलिए वो बच्चों को भी टीवी देखने से मना नही करती, मना करेंगी तो बच्चे घर के किसी और कौने में तोडा फोड़ी करेंगे और फिर वही माँ के सीरियल में बाधा ! इसीलिए सबसे पहले एक माँ को और अधिक जिम्मेदार बनना होगा, उसका बच्चा किस दिशा में जा रहा है इसका ध्यान रखना होगा, उसे समय-समय पर सही और गलत के बारे में बताना होगा, समझाना होगा तभी कुछ बात बन सकती है !

मैं बात टीवी पर महिलाओ को बेहूदगी से दिखाए जाने की कर रही थी ! फिल्मो या सीरियल में महिलाओ को छोटे कपडे (कई बार तो कपडे इतने छोटे होते हैं कि घर में बैठकर टीवी देखने वाले को शर्म आ जाये) पहनने या नॉनसेंस की तरह व्यव्हार करने के लिए आई थिंक कोई मजबूर नही करता होगा, वो सब अपनी ही मर्जी से करती होंगी तो फिर हर गुनाह के लिए सिर्फ एक पुरुष को ही कैसे दोषी ठहराया जा सकता है ! सिर्फ पैसा कमाने के लिए जो महिलाये अपनी हर सीमा को तोड़ देती हैं वो भी तो समाज के पतन के लिए उतनी ही दोषी है जितना कि गुनाह करने वाला ! जो महिलाये ऐसा करती है उनके पास सिक्यूरिटी होती है जिससे वो सेफ रहती हैं लेकिन उनके किये की सजा समाज की मासूम और भोली-भाली लडकियों को भुगतनी  पड़ती है , ऐसी स्थिति में “करता कोई है और भुगतता कोई है” यही कहावत चरितार्थ हो जाती है !

एक महिला को आधुनिकता के नकाब को उतारकर अपने लिए एक सीमा निर्धारित करनी होगी, कहा जाता है कि एक औरत दुर्गा का रूप होती है, वो अगर चाहे तो अपनी शक्ति से हर राक्षश का अंत कर सकती है, हाँ ऐसा हो सकता है लेकिन उससे पहले महिलाओ को खुद के अंदर दुर्गा वाला कोई गुण को लाना होगा, जब औरत खुद ही अपनी इज्जत को, अपने संस्कारो को पैसो के बदले बेच देती है तो उसके अंदर कहाँ से दुर्गा माँ जैसी शक्ति आएगी जो असुरो का सर्वनाश कर सके, आधुनिक होना है होइए लेकिन कम से कम अच्छी चीजो में, बुरी में नही ! कुछ भी पहनने से पहले कम से कम इतना तो सोच ले कि वो कपडे जो वो पहन रही हैं वो पहनने लायक भी हैं या नही, आखिर मनुष्य कपडे तन को ढकने के लिए पहनता है अगर ऐसे ही बेहूदगी से फिरना है तो फिर ……..

ऐसा पाया गया है कि अधिकतर मामलो में महिलाये ही महिलाओ के प्रति हो रहे अपराधो में सलग्न पाई गयी है, जब महिलाये ही महिलाओ की दुश्मन होंगी तो फिर आप किसको बदलने की बात करेंगे ! जब अपनी ही परछाई साथ छोड़ रही हो तो इसमें उजाले का कोई दोष नही होता, अगर सच में कुछ बदलना चाहते हैं तो अपने घर का माहौल बदलिए, महिलाये जो एक दुसरे को देखकर खुश नही हैं वो अपनी सोच बदले, जब सभी साथ होंगी, एक दुसरे के हक के लिए एक साथ मिलकर खड़ी होंगी, जब देश की सभी महिलाये वास्तव में देश में महिलाओ के प्रति हो रहे अपराधो को रोकना चाहेंगी, ख़त्म करना चाहेंगी तभी वास्तव में इस देश से, समाज से बुराई का अंत हो सकेगा !

ऐसा तभी हो पायेगा जब इन्सान महिला-पुरुष, रिश्तेदारी, बिरादरी, धर्म-जाति, गाँव-शहर, देश इन सभी से ऊपर उठकर सिर्फ एक इन्सान बनकर सोचना और जीना शुरू करेगा, तभी वह दुसरे की भावनाओ को समझ पायेगा, तभी वह दुसरे की इज्जत कर पायेगा तब ही असल मायनो में हर बुराई का अंत हो सकेगा !

सभी साथ होंगे तो न्याय की अपेक्षा सरकार से नही करनी पड़ेगी, तब ओन द स्पॉट न्याय होगा, और यही ओन द स्पॉट न्याय गुनाहगारो के मन में डर पैदा कर सकेगा !

ॐ नमः शिवाय …………!!!!


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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
September 23, 2014

एकै साधे सब सधै सब साधे सब जाय… अगर हम सभी अपने अपने घरों को ठीक कर लेंगे यह धरती स्वर्ग बन जाएगी …प्रिय सोनम बेहतरीन विचार के साथ सधा हुआ आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई … बस आवाज बुलंद करती रहो …हर परिस्थिति से लड़ने के लिए तैयार भी रहना होगा…. जय हनुमान ज्ञान गन सागर….

Ravinder kumar के द्वारा
September 19, 2014

सोनम जी, सादर नमस्कार. बदलाव की शुरुआत घर से ही होगी. कोई भी रिश्ता निभाने से पहले खुद को एक अच्छा इंसान बनाना होगा. पुरुष हो या महिलायें, चाहे वो साधारण हों या असाधारण को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में सोचना होगा. केवल पैसे और शोहरत के लिए कुछ भी करना गलत होगा. अपने चारों तरफ मर्यादा की एक रेखा खींचनी होगी. यदि हम ऐसा कर पाये तो बहुत कुछ सुलझ जाएगा. ऐसा करना कठिन है पर असंभव नहीं. सोनम जी, बेहतरीन लेख के लिए आपको बधाई. लगता है काफी दिनों से चिंतन चल रहा था. तभी आप दिखे नहीं. लिखते रहिये.

    Sonam Saini के द्वारा
    September 20, 2014

    आदरणीय रविंदर कुमार जी सादर नमस्कार …सबसे पहले इतने दिनों बाद भी मुझे याद रखने के धन्यवाद ….आप की बात से सहमत हूँ, ऐसा करना कठिन तो है लेकिन असंभव नही …..काफी दिनों से लिख तो रही हूँ लेकिन एक सीमा निश्चित हो गयी है अब पहले की तरह ज्यादा समय लेखन को नहीं दे पाती हूँ, समय की कमी रहती है इसलिए इधर का रुख भी कम ही हो पाता है ….आपकी अपनत्व भरी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ …धन्यवाद ..

sanjay kumar garg के द्वारा
September 19, 2014

बेबाक़ व् सटीक अभिव्यक्ति सोनम जी! सधन्यवाद!

    Sonam Saini के द्वारा
    September 20, 2014

    आदरणीय संजय कुमार गर्ग जी नमस्कार ….धन्यवाद ….

sadguruji के द्वारा
September 18, 2014

‘अगर सच में कुछ बदलना चाहते हैं तो अपने घर का माहौल बदलिए, महिलाये जो एक दुसरे को देखकर खुश नही हैं वो अपनी सोच बदले, जब सभी साथ होंगी, एक दुसरे के हक के लिए एक साथ मिलकर खड़ी होंगी, जब देश की सभी महिलाये वास्तव में देश में महिलाओ के प्रति हो रहे अपराधो को रोकना चाहेंगी, ख़त्म करना चाहेंगी तभी वास्तव में इस देश से, समाज से बुराई का अंत हो सकेगा !’ सही कहा है आपने ! बहुत अच्छा लेख ! अभिनन्दन और बधाई !

    Sonam Saini के द्वारा
    September 20, 2014

    आदरणीय सद्गुरु जी नमस्कार …..सहमति हेतु शुक्रिया …

yamunapathak के द्वारा
September 18, 2014

सोनम बहुत दिनों बाद मंच पर आई हो बहुत सही ब्लॉग लिखा है …सच कहूँ महिलाएं ही एक दूसरे के दुःख को काम और ज्यादा करने की शक्ति रखती हैं सहमत हूँ साभार

    Sonam Saini के द्वारा
    September 20, 2014

    आदरणीय मैं सादर नमस्कार ……जी ये एक कड़वा सत्य है कि महिलाये ही महिलाओ की दुश्मन है ….ब्लॉग पर आने और सहमति के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद मैम…..


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