Meri udaan mera aasman

हार नही है जीत नही है जीवन तो बस एक संघर्ष है ........

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जानना चाहती हूँ ....

Posted On: 18 Dec, 2014 social issues,Others में

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सुकून थोडा सा चाहिए जीने के लिए
मौत तो आएगी एक दिन मुझे मालूम है …


दिल में एक हलचल मची हुई है, लगता है जैसे कोई तूफान उठा हो, सही-गलत, सच-झूठ, इन सबके बीच में मन उलझा हुआ है, सच कहूँ तो शाम तक सब ठीक ही था, मन में जितनी भी हलचल है सब शाम के बाद से ही उठी है, दिन भर के काम के बाद शाम को जैसे ही व्हाट्सअप्प ऑन किया फटाफट मेसेज आया, मेसेज एक जलती हुई मोमबत्ती के साथ कुछ इस तरह लिखा था …


Please keep this candle as your profile DP for One day: To pay Homage to 138 Children of Army School of Peshawar.


फेसबुक ऑन किया तो अलग-अलग शब्दों में पिरोये हुए अलग-अलग स्टेटस को एक ही अर्थ देते हुए देखा तो समझ आया कि आखिर हुआ क्या है, वापस से फिर व्हाट्सअप्प ऑन किया और फिर से वो मेसेज पढ़ा, अब तक मेरी कांटेक्ट लिस्ट में अधिकतर लोगो की डी पी में वो मोमबत्ती वाली तस्वीर लग चुकी थी ! हाँ ये अलग बात है कि मैंने अब तक नही लगाई, क्योंकि ये मेरी व्यक्तिगत राय है कि व्हाट्सअप्प या फेसबुक पर प्रोफाइल में मोमबत्ती की फोटो लगाने से किसी की आत्मा को शांति मिल जाएगी, हाँ अगर हम सच्चे मन से भगवान् से उनकी आत्मा को शांति देने और मुक्त करने की प्रार्थना करे तो शायद कुछ असर हो, जो मैंने किया ही है, ! जानती हूँ कि अक्सर सच्चे मन से की गयी दुआये बहुत जल्दी कुबूल हो जाती हैं ! कुछ ने देखम देखी फोटो लगा दी और दूसरी और कुछ लोग ऐसे भी है जिन्होंने वो फोटो लगे है और जो सच में उस निंदनीय घटना से सदमे में हैं ! जिनका दिल वास्तव में उन बच्चो, उनके माता पिता और शिक्षको के लिए रोया है !


मौत –एक अनसुलझी कहानी, मौत जो बिना रिश्ते के भी अपने लिए पराये लोगो के दिलो में हमदर्दी, सहानुभूति पैदा कर देती है, मौत जो एक अनजान इन्सान के दिल में एक अनजान इन्सान के लिए दर्द पैदा कर देती है ! अभी कुछ दिन पहले ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज फिल की मौत एक गेंद लगने से हुई थी, तब उस खबर ने या यूँ कहूँ की फिल ने मन पर इतना प्रभाव डाला की उससे सम्बंधित हर एक खबर मैंने अख़बार में ढूंड-ढूंड कर पढ़ डाली, न जाने क्यों बार-बार यही लगता था कि वो मरा नही है अभी, वो वापस आएगा, आकर खेलेगा, पहले की ही तरह, हलाकि इस घटना से पहले मैंने कभी उसका नाम तक भी नही सुना था !


जहाँ मैं काम करती हूँ, उस कॉलेज में फर्स्ट इयर का एक स्टूडेंट था “शुभम कुमार गुप्ता”, तीन बहनों का एकलौता भाई, छट पूजा पर अपने घर बिहार गया था और फिर कभी वापस लौट कर नही आया ! वह अपने पिता के साथ नदी में खड़े होकर पूजा कर रहा था, न जाने ऐसा क्या हुआ कि पिता और बेटा दोनों ही नदी में डूब गये, दोनों की मौत हो गयी ! उसकी मौत भी मेरे लिए किसी सदमे की तरह ही थी, पहले मुझे उसका नाम तक भी नही पता था और बाद में मुझसे वो भुलाया नही जा रहा था !


दिल्ली में एक नाबालिक लड़के ने एक मंहगा मोबाइल खरीदने के लिए एक 12 साल के बच्चे को किडनैप कर लिया और उसकी हत्या कर दी, एक दोस्त ने मामूली सी बात पर अपने 19 साल के दोस्त की चाकू घोप कर हत्या कर डाली, माँ-बाप का वो एकलौता बेटा था !


दामिनी उर्फ़ ज्योति के बारे में जब-जब सोचती हूँ मेरी रूह तक कापने लगती है ! और भी बहुत सी घटनाये है जो कई बार बिना बात के दुखी कर जाती है !
बिना बात के – बिना बात के इस लिए कि मौत पर किसी का कोई बस नही चलता ! मौत जाति, धर्म, देश देखकर नही आती, न वो ये देखती है कि सामने वाला बच्चा है, बुढा है या जवान ! एक सवाल जिसका जवाब ढूँढना चाहती हूँ वो है इस दुनिया का रहस्य ! सुना है भगवान् सबको उसके कर्मो की सजा देता है, अगर ऐसा है तो फिर पेशावर में जो हुआ वो क्यों हुआ, क्योंकि अगर मजहब और देश के अनुसार चले तो वहां तो भगवान रहते ही नही है, वहां तो खुदा रहते हैं, फिर खुदा ने क्यों और किस लिए उन मासूम से बच्चो को सजा दी, उनके माता-पिता को कभी न भरने वाले जख्म दिए ? और अगर वो खुदा ने नही किया, उसका जिम्मेदार खुदा नही है तो फिर ऐसा क्यों कहा जाता है कि उस रब की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नही हिलता !


अगर सब कुछ उस रब, उस खुदा, उस भगवान की मर्ज़ी से होता है तो फिर इसके लिए किसी इन्सान को क्यों दोष ? मैं समझना चाहती हूँ, ये जानना चाहती हूँ कि आखिर इस दुनिया का राज़ क्या है, मौत क्या है, जो लोग अचानक गाड़ी के नीचे आकर मर जाते हैं वो उनके खुद के कर्मो की सजा होती है या उस गाड़ी वाले का दोष या फिर भगवान की मर्ज़ी ?? दामिनी के साथ जो अमानवीय व्यवहार हुआ उसका जिम्मेदार आखिर कौन है ??? भगवान या इन्सान ???
दुनिया में फैले हुए आतंकवाद को जब देखती हूँ, कुछ मुस्लिम देशो में महिलाओ को निकाह से इंकार करने पर क़त्ल कर देने के बारे में जब पढ़ती हूँ, अपने ही देश में लुट, हत्या, बलात्कार जैसी घटनाओ को बढ़ते हुए जब देखती हूँ तो एक विचार मन में ये भी आता है कि क्या फायदा है इस जीवन का ? किस लिए मैं सपने देखती हूँ, किस लिए आगे बढ़ने के लिए मेहनत करती हूँ, लगता है जैसे सब बेकार ही हो, कल का क्या भरोसा, न जाने कब कौन से पल में मेरे साथ क्या हो जाये, न जाने कब कोई आतंकवादी अपना निशाना हमे बना दे, न जाने कब सब खत्म हो जाये, और फिर इस शरीर का भी तो कोई भरोशा नही है, कब कौन सी बीमारी इसे जकड ले, कब एक जान लेवा बीमारी आकर मुझसे कहे कि चल अब तेरा वक़्त पूरा हुआ !


बहुत से सवाल हैं जिनके जवाब ढूँढना चाहती हूँ, इस दुनिया के रहस्य को जानना चाहती हूँ, मौत का सही अर्थ क्या होता है ये जानना चाहती हूँ, जीवन क्यों मिलता है ये जानना चाहती हूँ ! जानना चाहती हूँ कि जिस मन में बाहरी रूप से कोई काँटा नही चुभता, जिसमे अंदर कोई आता-जाता नही दीखता, जिसमे कोई खंज़र नही चुभोता उस मन को इतनी पीड़ा, इतना दर्द क्यों होता है?? क्यों वो बेचैन रहता है ?? वो कौन सी आँखे हैं जो इन बाहरी आँखों के बंद होने पर भी किसी को देख लेती है? जबान खामोश रहती है मगर न जाने कौन है वो जिसकी आवाज़ मेरे अंदर गूंजती रहती है ??


बहुत कुछ बाकि है जानना, अपने इस जीवन को इसी खोज के लिए समर्पित करना चाहती हूँ, जितना वक़्त है उसमे सब कुछ जान लेना चाहती हूँ ताकि आखरी उस वक़्त में मुझे मेरी मौत का कोई अफ़सोस न हो ! जान लेना चाहती हूँ कि उस औरत की क्या गलती थी जिसने अपना पति और बेटा दोनों को एक साथ खो दिया ! जानना चाहती हूँ कि मौत आती है इन्सान को साथ ले जाती है और पीछे छोड़ जाती है उनके अपनों को रोने- बिलखने के लिए आखिर क्यों ???

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
September 29, 2015

मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती; आगे आती थी हाले दिल पे हंसी, अब किसी बात पर नहीं आती । मौत का राज़ जानना चाहती हो सोनम ? कौन बला तूफानी है, मौत को ख़ुद हैरानी है, आए सदा वीरानों से, जो पैदा हुआ वो फ़ानी है । तुम्हारा दर्द मैं समझ सकता हूँ लेकिन ऐसे दर्दों को सहना तो प्रत्येक संवेदनशील मनुष्य की नियति है । तड़पते वही हैं जो सारे जहाँ का दर्द अपने जिगर में लिए फिरते हैं । पत्थरदिल लोगों को ऐसी तकलीफ़ें नहीं होतीं । मैं भी तुम्हारी ही तरह संवेदनशील हूँ सोनम । इसीलिए कभी-कभी लगता है कि अगर ये दुनिया ऐसी ही है और इसका निज़ाम ऐसे ही चलता है तो मेरे जैसे शख़्स का पैदा होना ही ग़लत है । लेकिन जब पैदा हुए हैं तो जीना भी पड़ता ही है । अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे ? तुम्हारे सवालों के जवाब ख़ुदा भी देने वाला नहीं सोनम । बुद्ध की तरह उन्हें स्वयं ही ढूंढो और जान लो कि यह संसार दुखमय ही है । सुख तो केवल दो दुखों के बीच का अंतराल है । अगर तुम स्वयं को सुखी अनुभव कर रहे हो तो समझ लो कि एक दुख आकर गया है और दूसरा आने वाला है । जिसका दुख तुम दूर कर सको, करो और इसी में अपना संतोष पाओ । लेकिन फिर भी ये न भूलो कि दूसरों के आँसू पोंछने से अपने ज़ख्म नहीं भरते हैं ।

sadguruji के द्वारा
December 31, 2014

आदरणीया सोनम सैनी जी ! सादर अभिनन्दन ! आपको और आपके समस्त परिवार को नववर्ष की बहुत बहुत बधाई ! पारिवारिक शुभकार्यों और सांसारिक उन्नति के साथ साथ आपकी सुंन्दर और सार्थक लेखनी भी चलती रहे ! आपकी विचारणीय रचनाएँ नववर्ष में भी इस मंच की शोभा बनती रहें ! बहुत बहुत शुभकामनाएं !

    Sonam Saini के द्वारा
    May 9, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी सादर नमस्कार ….मैं बहुत आभारी हूँ कि आप हमे याद रखते हैं …..शुभकामनाओ हेतु बहुत बहुत धन्यवाद सर ……आशा है आप भी कुशल मंगल होंगे ….

pkdubey के द्वारा
December 26, 2014

एक प्रार्थना की पंक्ति है – संसार का जो सार था ,वो आज तक जाना नहीं ,पैदा हुए बहुबार जग में ईश पहचाना नहीं| यही सब देखकर बुद्धिजीवियों ने कहा,ब्रह्म सत्य ,जगत मिथ्या | सादर आभार लेख के लिए आदरणीया |

    Sonam Saini के द्वारा
    December 27, 2014

    आदरणीय पीके दुबे जी नमस्कार …..आपके विचारो का स्वागत है … ब्रह्मा सत्य , जगत मिथ्या …कम शब्दों में बहुत बड़ी बात कह दी आपने …नमस्कार …

bhagwandassmendiratta के द्वारा
December 26, 2014

सोनम जी बहुत बहुत स्नेह, आज आप का ब्लॉग पढ़ने का अवसर मिला सुविचारित एवं सुन्दर रचना है नाम देख कर सोचा कि आप जागरण के मंच पर नए रचनाकार हो परन्तु ब्लॉगों कि संख्या पर ध्यान गया तो बहुत कुछ पाया अच्छा लिखा है निरंतर लिखते रहो आपके द्वारा उठाये गए सभी प्रश्नो के उत्तर श्रीमद भगवद गीता में हैं परन्तु समझने के लिए बहुत ही सब्र और संतोष कि आवश्यकता होगी बार बार अध्यन करने पर ही तत्व समझ में आ पाएंगे अगर प्रश्नो के उत्तर चाहियें तो कृपया पढ़ना जरूर कभी कभार मैं भी ब्लॉग पर लिखता हूँ मेरे ब्लॉग का नाम ‘मेरा देश मेरी बात ‘हैं गीता को समझने में मैं कोई मदद कर सकूँ तो स्वयं को धन्य समझूंगा आप चाहें तो b.dass1@gmail.com पर भी संपर्क कर सकते हैं लेख के लिए एक बार फिर साधुवाद भगवान दास मेहंदीरत्ता

    Sonam Saini के द्वारा
    December 27, 2014

    आदरणीय भगवानदास सर जी नमस्कार …..ब्लॉग पर आपका स्वागत है …अपना कीमती समय ब्लॉग को देने के लिए शुक्रिया ….आपके सुझाव से गीता पढ़ना शुरू करुँगी ….सिर्फ पढ़ना ही नही बल्कि समझना भी ….शायद जवाब मिल ही जाये …..आपके लिए कीमती सुझाव, सहायता व परामर्श के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर जी ….

sadguruji के द्वारा
December 26, 2014

आदरणीया सोनम सैनी जी ! विचारणीय लेख के लिए अभिनन्दन और बधाई ! आपका लेख मुझे अच्छा लगा ! मेरे विचार से तो हमारे विकास और जीवन से कुदरत कोई सरोकार नहीं रखती है ! उसकी दृष्टि में हमारे जीवन और विकास का कोई महत्व नहीं है ! यही वजह है कि वो हमारे जीवन को और विकास को कभी भी तहस नहस कर देती है ! रही बात भगवान की तो उसकी अनुभूति के लिए भक्ति जरुरी है ! ध्यान रहे कि भगवान भी सिर्फ भक्त के लिए हैं ! बाकी सबके लिए तो यही कर्म प्रधान कुदरत या प्रकृति है ! मुझे एक चीज और अनुभव में आती है कि हम जो कुछ चाहते हैं, सबकुछ वैसा नहीं होता है ! बल्कि कुदरत जैसा चाहती है, वैसा होता है ! विरक्ति और भक्ति से अच्छा कुछ भी नहीं ! इस भावना को जारी रखो ! यही वास्तविक रूप से कल्याणमय है ! आशीर्वाद और शुभकामबनाओं सहित !

    Sonam Saini के द्वारा
    December 27, 2014

    आदरणीय सदगुरु जी नमस्कार …..मैं बहुत छोटी हूँ सर ,,,उम्र से भी और अक्ल से भी …..आदरणीया कहलाने लायक नही हूँ ……आपकी प्रतिक्रिया का हमेशा ही इंतज़ार रहते है लेकिन इस लेख पर कुछ ज्यादा था …..हम जो कुछ चाहते हैं, सबकुछ वैसा नहीं होता है ! बल्कि कुदरत जैसा चाहती है, वैसा होता है ! विरक्ति और भक्ति से अच्छा कुछ भी नहीं ! आप की बात से पूर्णत सहमत हूँ……आशीर्वाद और शुभकामनाओ के लिए तहे दिल से शुक्रिया ….

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
December 25, 2014

सोनम जी चिंतन से वैराग हो जायेगा बस ओम शांति शांति जपो और अपनी दिन चर्या मैं लग जाओ

    Sonam Saini के द्वारा
    December 27, 2014

    नमस्कार सर जी …. :) ओम ..जप रही हूँ लेकिन अभी ध्यान से भटक रही हूँ,,,,,ओम जपने के साथ साथ जिस दिन ध्यान लगना शुरू होगा उस दिन ही वैराग हो गा …..बहुत-बहुत आभार और धन्यवाद सर जी ….

आर.एन. शाही के द्वारा
December 19, 2014

ऐसा बहुत कुछ है जो हम नहीं जानते, और न कभी जान पाएँगे । हमें इतना कुछ जानने की शायद ज़रूरत भी नहीं है । हमारी हर गतिविधि उस पाक परवरदिगार के वृहत्तर मकसदों के सापेक्ष प्रेरित होती है, जिन्हें हम चाहकर भी समझ नहीं सकते । दुर्भाग्यवश मनुष्य को बुद्धि क्या मिल गई, वह खुद को ही खुदा समझने लगा है । सच्चाई ये है कि आज बेबुद्धि और बेज़ुबान ही संभवत: हमारी अपेक्षा उस आलमाइटी के ज़्यादा क़रीब हैं । हम जब इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवेलप करते हैं, सड़कें बनाते हैं, बिल्डिंग्स के लिए ज़मीन में नींव खोदते हैं, तो नहीं चाहते हुए भी जाने अनजाने में असंख्य छोटे छोटे जीव जन्तुओं की हत्या और उनके आशियाने उजाड़ने का काम कर डालते हैं । ऊपर वाला जब अपने विकास कार्यों को अंजाम देने के लिए, सृष्टि को चलाने के लिए वही काम करता है, तो हमें इतना बुरा क्यों लगता है ?

    Sonam Saini के द्वारा
    December 27, 2014

    आदरणीय शाही सर जी नमस्कार ……बहुत दिनों बाद आपको देखा ….फेसबुक से तो लगता है जैसे आप अदृश्य ही हो गए हैं …..आपकी प्रतिक्रिया काफी हद तक मेरी जिज्ञासा को, मेरे सवालो को शांत करती है, …हम जब इन्फ्रास्ट्रक्चर डेवेलप करते हैं, सड़कें बनाते हैं, बिल्डिंग्स के लिए ज़मीन में नींव खोदते हैं, तो नहीं चाहते हुए भी जाने अनजाने में असंख्य छोटे छोटे जीव जन्तुओं की हत्या और उनके आशियाने उजाड़ने का काम कर डालते हैं । ऊपर वाला जब अपने विकास कार्यों को अंजाम देने के लिए, सृष्टि को चलाने के लिए वही काम करता है, तो हमें इतना बुरा क्यों लगता है ?….आपका कहना सही है लेकिन मैं इसी क्यों का जवाब ढूँढना चाहती हूँ ….

    आर.एन. शाही के द्वारा
    December 27, 2014

    उम्र से ज़्यादा सोचती हो । इस क्यों का कोई अर्थ नहीं होता । ब्रह्माण्ड के विस्तार की भी कोई न कोई सीमा है । जो पैदा हुआ है वह समाप्त भी होगा । कोई तो है जिसने सब कुछ बनाया है, वही सब मेनटेन भी करता है अपने तरीके से । वह अपना जॉब करता है और चाहता है कि हम भी अपना जॉब करें, जो उसके द्वारा हमारे लिए निर्धारित है । इससे अधिक दिमाग लगाने की ज़रूरत नहीं होती ।

jlsingh के द्वारा
December 18, 2014

प्रिय सोनम, सच कहो तो मेरे पास तुम्हारे प्रश्नों का जवाब नहीं है. पर अपनी समझ और अनुभव के अनुसार उत्तर देने की कोशिश कर रहा हूँ. मेरी समझ से धर्म ग्रंथों,ऋषि-मुनियों, महात्माओं आदि के सन्देश का तात्पर्य यही है कि हम सद्कर्म की राह पर चलें. अठारहों पुराण में ब्यास जी के दो ही वचन प्रधान हैं- परोपकार करने से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है और दूसरों को पीड़ा पहुँचाने से बड़ा कोई पाप भी नहीं है. पर हमने उन संदेशों को धरोहर के रूप में संजो दिया. नयी नयी व्याख्याएं पैदा की गयी, धर्म के नाम पर अनेकों अनाचार हुए और धर्म का विकृत रूप आज हम सबके सामने है. यह मनुष्य कहते हैं परमात्मा की सबसे श्रेष्ठ सृष्टि है …पर यही मनुष्य आज जानवर, शैतान, हैवान से भी बदतर हो गया है….और आगे क्या होनेवाला है, शायद किसी को नहीं पता…

    Sonam Saini के द्वारा
    December 27, 2014

    चाचा जी नमस्कार ….जी आगे क्या होने वाला है किसी को नही पता ….कभी-कभी जब बहुत ज्यादा मन पर चोट लगती है तो ये पागल हो जाता है और फिर यही सब सवाल और भी न जाने क्या-क्या जवाब के लिए इधर-उधर भटकने लगता है ….ये जीवन एक पहेली है ….

abhishek shukla के द्वारा
December 18, 2014

सोनम! आपके हर शब्द कचोटते हैं…दिल को लगते हैं । छोटी-छोटी बैटन को आलेख में सफलता से पिरोना लेखक की असली कला है और यह कला आपके हर आलेख में झलकती है। ऐसे ही लिखती रहो बहन! शुभ कामनाएं। अंतिम पंक्तियों का जवाब बस एक शब्द का है “आपेक्षा”। हाँ यही सभी दुखों का कारण है, दुर्भाग्य से इसका कोई निवारण नहीं है।

    Sonam Saini के द्वारा
    December 27, 2014

    अभिषेक जी नमस्कार …..देरी के लिए क्षमा चाहूंगी ….आपने इतना सराहा अच्छा लगा …मैं तो बस अपने मन की बेचैनी को लिखती हूँ, ये आप सभी को पसंद आती है खुशनसीबी है मेरी ….अपने विचार रखने और सराहना के लिए धन्यवाद ….

sudhajaiswal के द्वारा
December 18, 2014

सोनम, बहुत ही विचारणीय आलेख है, बहुत से ऐसे सवाल और अनसुलझे रहस्यों से जिंदगी में सामना होता है| मौत का रहस्य ऐसा है जिस पर किसी का वश नहीं चलता, जिंदगी में जब जो होना है होकर ही रहता है|

    Sonam Saini के द्वारा
    December 27, 2014

    जी सही कहा आपने दी ….जिन्दगी में जब जो होना होता है होकर ही रहता है उस पर किसी का वश नही चलता …प्रथम प्रतिक्रिया और मेरे ब्लॉग पर आने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद … :)


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