Meri udaan mera aasman

हार नही है जीत नही है जीवन तो बस एक संघर्ष है ........

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चक्रव्यूह .........

Posted On: 19 May, 2015 Others,social issues,Hindi Sahitya में

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महाभारत में देखा था अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसते हुए, एक वीर योधा होने के बावजूद भी वह चक्रव्यूह को भेद नही पाया, हर संभव प्रयास किया मगर असफल रहा, अंत में मृत्यु को प्राप्त होकर ही उस चक्रव्यूह से बाहर निकल पाया !


एक बच्चा जब जन्म लेता है तब वह किसी को नही जानता, जैसे-जैसे दिन गुजरते हैं उस बच्चे की सोचने समझने की शक्ति भी विकसित होती जाती है, अब वो अपनी माँ को जानता है, पिता को जानता है और धीरे-धीरे उम्र बढ़ने के साथ ही घर के, पड़ोस के लोगो को भी जानने लगता है ! फिर वह बच्चा थोडा और बड़ा होता है, स्कूल जाने लगता है, वहां नये-नये दोस्त बनते हैं, नये लोगो से मिलना होता है, उनसे मेल-मिलाप होता है, फिर उन सभी दोस्तों में से कोई एक या दो दोस्त खास बन जाते हैं !


वक़्त थोडा और गुजरता है, अब वो बच्चा जो स्कूल जाता था कॉलेज जाने लगता है, स्कूल के अनगिनत दोस्तों के साथ-साथ कॉलेज में भी अनगिनत दोस्त उसका इंतजार कर रहे होते हैं, वक़्त थोडा और गुजरता है, अब वह बच्चा, बच्चा नही रहता, बड़ा हो जाता है, पढाई पूरी कर लेता है, नौकरी करने लगता है, ये वो समय है जब उसे लगता है कि वो अब अकेला नही है, उसके बहुत सारे दोस्त हैं, रिलेटिव्स है, उसका अपना एक परिवार है, माता-पिता हैं, भाई-बहन हैं, अड़ोसी -पडोसी हैं, कुल मिलकर अब उस छोटे से बच्चे को जानने वाले लाखो लोग हैं !


जैसे-जैसे उम्र का एक-एक दिन बढ़ता है वैसे-वैसे इंसान इस जीवन रूपी चक्रव्यूह में फँसता चला जाता है, बचपन से ही मोह-माया के ऐसे जाल में फँसने लगता है कि अगर जीवन में कभी किसी मोड़ पर निकलना भी चाहे तो भी अथक प्रयास के बावजूद भी नही निकल पाता !


अगर भावनाओ को नज़रअंदाज कर दिया जाये तो इस जीवन में ऐसा कुछ भी नही है कि इसे बेकार के मोह-माया में फंसकर बर्बाद किया जाये ! क्या रखा है इस दुनिया में, दूर तक देखो तो हर तरफ बस दर्द, दुःख, परेशानियाँ, नफरत यही सब तो भरा पड़ा है, कोई खुश नही, खुश हो भी तो कैसे, एक की ख़ुशी दूसरे से जुडी है और इस दुनियॉ में किसी को किसी दूसरे की खुशियो की परवाह कहाँ है !


पैसे नही है, गरीबी से ज़िंदगी भर जूझते रहो, अपनी शान को बरकरार रखने के लिए लोगो के सामने भीख मांगते रहो, इस काम के लिए पैसे चाहिए, अब दे दो, जैसे ही मेरे पास होंगे मैं लौटा दूंगा, पैसे आते हैं और उधार चुकाने में ख़त्म हो जाते हैं, जमीन का बटवारा हो गया फिर भी दोनों भाइयो को लगता है कि मुझ से ज्यादा दुसरे को मिल गयी, घर में देवरानी, जिठानी, सास घर के  काम को लेकर झगडती हैं, सब्जी में नमक कम है, दाल पकी नही ठीक से, उसने मेरे बारे में ये कहाँ, उसने वो कहाँ, रोटी कच्ची रह गयी, उसे ज्यादा गहने मिल गये, मुझे कम मिले, सोना-चांदी यहाँ तक कि आर्टिफीसियल गहनों पर भी लड़ाई-झगडे होते हैं !


मुस्कुराने का मन न हो तो भी पागलो की तरह सिर्फ दुसरो को दिखाने के लिए हँसते रहो, अपने आप को पूरी दुनिया के साथ इतना अटेच कर लो कि फिर उसके छोड़ कर जाने पर रोते रहो, बेवजह दुखी होते रहो, उसने मुझे छोड़ दिया, उसने मुझसे बात नही की. वो मुझे प्यार नही करता/करती , बला बला बला बला …………………


सारी जिंदगी इसी लड़ाई-झगडे में, ताने सुनने में, देने में, नमक, मिर्च, सब्जी- रोटी इसी सब में निकल जाती है, और अंत में मिलता क्या है, मौत ? वो भी कैसी होगी कौन जाने !


बहुत ऊब महसूस होने लगी है अब दुनिया को देख कर ! इसके रंग-ढंग देख कर, मन बार-बार कहता है कि चल मुक्त हो चल इस जहाँ से, कहीं दूर निकल जा, जहाँ ये झूठे रीति-रिवाज, कानून, नियम, ओहदे, और झूठे इन्सान कोई न हो, जहाँ कोई नमक मिर्च को लेकर झगडा न करे, जहाँ कोई अपना न हो और सब अपने हो, किसी से कोई अटैचमेंट नही, बस अपना कर्म करना हो ! जहाँ इन्सान सिर्फ अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए दुसरो की जिन्दगी के साथ न खेलता हो, लेकिन ये सब सोचना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल, इस जहान रूपी चक्रव्यूह से इस युग में भी जिन्दा रहते हुए निकलना नामुमकिन है, म्रत्यु ही शायद एक मात्र रास्ता हो इस चक्रव्यूह से निकलने का !


खैर जो भी हो, मैं तो बस निकलना चाहती हूँ, मुक्त होना चाहती हूँ, उस दर्द से जिसकी कोई ठोस वजह ही नही है, मुक्त होना चाहती हूँ उन आर्टिफीसियल रिश्तो से जो अपने होने का दंभ भरते हैं मगर सिर्फ ख़ुशी में, अमीरी में ! गरीबी में वही अपने रिश्ते अजनबियों की तरह साइड से निकल जाते हैं, :)


बार-बार एक ही सवाल मन में उठ रहा है कि क्या जिन्दगी के साथ रहकर भी मुक्त हुआ जा सकता है ???

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
May 24, 2015

ओम का नियम कहता है विभव (वोल्ट) के रास्ते में अवरोध का सामना करते हुए विद्युत धारा निकलती है … नदियां विभिन विघ्न बाधाओं के साथ कल-कल निनाद करती हुई आगे बढ़ती है …जीवन के झंझावातों में ही करूँ और मधुर संगीत का जन्म होता है …इसलिए जीवन से न हार जीने वाले …. और मैं क्या कहूँ बहुतों ने अपने अपने ढंग से तुम्हारे आलेख की व्याख्या की है मैं भी सभी विद्वत्त जनों का समर्थन करता हूँ……चाचा

    Sonam Saini के द्वारा
    May 24, 2015

    चाचा जी नमस्कार …..इस बार आप लेट हो गए हो आने में …. जीवन से हार नही बस ये जीवन के उद्देश्य को समझने की एक छोटी सी कोशिश है चाचा जी …… आशीर्वाद बनाये रखे ….आभार

anilkumar के द्वारा
May 22, 2015

आदरणीय सोनम जी , चक्रव्यूह तो जीवन में सतत चलने वाले महाभारत का एक अंग है । यहां तो  नित्य कोई न कोई व्यूह रचना होती है । इसी संघर्ष में अरूणा शानबाग को गहरे जख्म देने वाले लोग  भी है और बियालिस वर्षों तक बिना किसी सम्बन्ध के उसकी सतत सेवा करने वाला नर्सों का समुह  भी है । आप तो स्वयं मानती है कि - हार नहीं जीत नहीं , जीवन तो बन एक संघर्ष है - यह जीवन है  तो संघर्ष तो रहे गा ही । परन्तु यदि आप सत्य के लिये , न्याय के लिये , दूसरों के लिये संघर्ष करें गी  तो उस संघर्ष में ही बिना किसी जय या पराजय के भाव के आनन्द की अनुभूति होगी । जैसी कि उन  नर्सों के समुह को हुई होगी । और सम्भवतः गीता में भगवान श्री कृष्ण भी यह ही कहना चाहते हैं । 

    Sonam Saini के द्वारा
    May 24, 2015

    आदरणीय अनिल कुमार जी नमस्कार …..जी जीवन सिर्फ संघर्ष ही है, ये लेख में मैंने जो महसूस किया है बस वही लिखा है, बाकि और कुछ नही, मुझे लगता है की जीवन में संघर्ष करना, आनंद की अनुभूति करना और मुक्त होने में बहुत फर्क है, मैंने मन को उन भावनाओ से मुक्त करने के बारे में लिखा है जो इंसान को कमजोर बना देती हैं, जो दुःख और सुख में अंतर पैदा करती हैं …….मैं आपके विचारो का सम्मान करती हूँ ….. आपकी बात भी अपनी जगह सच है …समय देने व कीमती प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद सर …

Shobha के द्वारा
May 21, 2015

प्रिय सोनम बहुत सुंदर लेख “खैर जो भी हो, मैं तो बस निकलना चाहती हूँ, मुक्त होना चाहती हूँ, उस दर्द से जिसकी कोई ठोस वजह ही नही है, मुक्त होना चाहती हूँ उन आर्टिफीसियल रिश्तो से जो अपने होने का दंभ भरते हैं मगर सिर्फ ख़ुशी में, अमीरी में ! गरीबी में वही अपने रिश्ते अजनबियों की तरह साइड से निकल जाते ” जीवन बहुत सुखदायी है यदि इसमें नमक मिर्च न हो तो संतों का समाज बन जायेगा जैसी दुनिया हैं भगवान की बनाई है हर पात्र अपने अनुसार चलता है शोभा

    Sonam Saini के द्वारा
    May 21, 2015

    आदरणीय शोभा मैम सादर नमस्कार …….सबसे पहले तो लेख को पसंद करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद मैम …जी मानती हूँ कि ये दुनिया भगवान जी बनाई हुई है और हर पात्र अपने अनुसार चलता है लेकिन मैम दुनिया का हाल देखती हूँ तो बहुत दुःख होता है, इंसान के बुरे कर्मो के पीछे भगवान जी तो नही हो सकते ……जहाँ तक मुझे लगता है ये भी इंसान के कर्मो पर ही निर्भर करता है …..संतो का समाज न बनकर अगर ये समाज एक सभ्य समाज ही बन जाये तो वही काफी है ….इतना क्राइम हो रहा है कि मन बहुत खिन्न हो जाता है …..लेख को समय देने आभारी हूँ मैम …धन्यवाद …

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
May 21, 2015

मेरी सोच को आपने शब्द दे दिया है / धन्यवाद / आभार /

    Sonam Saini के द्वारा
    May 21, 2015

    आदरणीय राजेश जी नमस्कार …….मुझे ख़ुशी हुई कि आपको मेरे शब्दों में अपने विचार नज़र आये …समय देने के लिए आभारी हूँ ….. धन्यवाद

sadguruji के द्वारा
May 21, 2015

आदरणीया सोनम सैनी जी ! जीवन का यथार्थ बयान करने के लिए बहुत बहुत अभिनन्दन और बधाई ! आपका लेख पढ़कर मुझे अपने एक परम पूज्य ब्रह्मनिष्ठ गुरुदेव याद आ गए ! आज से वर्षों पहले मैंने भी उनसे यही सवाल पूछ था ! उन्होंने मुझे समझाया था कि जैसे एक जलते हुए दिए से आप बहुत सारे दिए जला सकते हैं ! यही बंधन है ! जीवन भर कोई अन्य दीप न जलाइए, यही मोक्ष है ! अब इसपर आप विचार कीजिये ! इस पठनीय और विचारणीय प्रस्तुति के लिए आभार !

    Sonam Saini के द्वारा
    May 21, 2015

    आदरणीय सद्गुरु जी सादर नमस्कार ……अपने इस लेख पर आपके विचारो को पढ़ने लिए मैं उत्सुक थी, आपके गुरु जी की बात ठीक है “जैसे एक जलते हुए दिए से आप बहुत सारे दिए जला सकते हैं ! यही बंधन है ! जीवन भर कोई अन्य दीप न जलाइए, यही मोक्ष है” लेकिन एक साधारण मानव कैसे इन दीयो को जलाने से बचे यही एक कठिन काम है, आपने जो रास्ता दिखाया है मैं इस पर विचार कर रही हूँ लेकिन इसको एक्सेक्युट कैसे किया जाये यही मुश्किल है, राह दिखाने व कीमती समय देने के लिए आभारी हूँ…..आशीर्वाद बनाये रखे ….


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